इतिहास

अचलपुर का इतिहास लगभग ५०० साल पुराना है

कहा जाता है की इस गाव का नाम अचलपुर इस लिए रखा गया      पुराने समय की बात है  जब अचलपुर एक प्राक्रतिक संसाधनों से युक्त था जब यहा पर शेर और अन्य जंगली जानवर हुआ करते थे ,क्यूंकि बहुत घना जंगल हुआ करता था

पहले यहा प्रतापगढ़ एवं देव गढ़ के राजा यहा शिकार करने आया करते थे , गाँव के तालाब के किनारे एक शिकार गृह भी बना हुआ है . जहा पर राजा शिकार किया करते थे

गाँव में बहुत सारे जंगल एवं पर्याप्त घास पानी उपलब्ध था इसलिए यहा पर लोग पशु पालन पर ज्यादा ध्यान देने लगे. और लोग धीरे धीरे जंगल काट कर खेती हेतु ज़मीन तेयार करने लगे और लकडिया काटकर कोयले बनाकर प्रतापगढ़ ले जाकर बेचने लगे जिसमे धीरे धीरे जंगल खत्म होते गए .
साथ ही पशु ओ की खुली चराई एवं इधन हेतु अंधाधुन्द पेड़ो की कटाई होती रही जिसमे पिछले 18 वर्षो से यहा पर लगभग पेड़ ख़त्म हो गये एवं यहा पर अब इधन की लकडिया भी बार से खरीदनी पड़ती हे .
गाँव में तालाब है जिसमे बहुत पानी एकत्रित होता है परन्तु रबी में गेहू की खेती में इसका अधिकतम उपयोग कर जाता है . अत गर्मियों में पशुओ के पिने हेतु भी पानी नही पाया जाता था अत लोग अपने जानवरों को पानी पिलाने हेतु गाँव से बाहर जाते थे , साथ ही यहा पर कुए के पानी का स्तर भी बहुत गहरा हो गया है
इस शेत्र के लोग बहुत परेशान है इस लिए पिछले ४ सालो में गाँव में प्राक्रतिक संसाधन के प्रबन्धन हेतु विभिन्न प्रकार के कार्यो हेतु अग्रसर हुए है , इस हेतु पंचायत द्वारा ऍफ़ इ एस (FES). संस्था के साथ मिलकर विभिन्न कार्य किये गये जेसे यहा पर मिटी एवं जल के सरक्षण हेतु हर एक खसरा नम्बर का तकनिकी रूप से सर्वे कर प्लान बनाकर उन पर आवश्यकता अनुसार कार्य करवाए जा रहे है
तालाब से पानी के उपयोग हेतु गाँव द्वारा हर 1 बीघा पर 100 रुपये टेक्स लगवाया जा रहा है एवं फव्वारा सेट से खेती की जा रही है , साथ ही सभी को अधिकतम छ बार सिंचाई हेतु स्वीक्रत दी जाती है ताकि गर्मी में भी उपयोग हेतु उपलब्ध रहे

गाँव में सभी वर्ग को चारा मिले इस हेतु जलग्रहण विकास समिति द्वारा नवलखा में खसरा नंबर1708 को विकसित किया गया है जिसका एरिया 80 बीघा इसमें कुल 3000
पोधा रोपण किया गया एवं देशी पेडो का भी बीजारोपण किया गया था साथ ही चारे का भी बिज लगाया गया था जिसकी पूरा गाँव मिलकर सुरक्षा करता है एवं इसमें अचलपुर जलग्रहण के लोगो द्वारा कार्य हेतु 20 % सहयोग किया जाता है आज यहा 2850 पोधे चल रहे है एवं चारा खड़ा है जिसे लोग निश्चत राशी जमा करा कर उपयोग करते है इसमें गावं में सभी को चारा काटने हेतु दिया जाता है ,एक प्रकार का प्रयास पंचायत ने प्रकतिक संसाधनो को पुनः बनाने ओर ओर सुरखा हेतु किया है .

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6 टिप्पणियाँ “इतिहास” पर

  1. बहुत अच्छे परिचय है, गाँव के इतिहास, आर्थिक परिस्थिति और सामाजिक परिस्थिति के बारे में. और जानकारी देने के लिए एक छोटा टेबल दे सकते है, क्योंकि लोग अगर इस पेज पर आएँगे, तो उनको संक्षिप्त में बाकी पागों मे मिलने वाले सूचनाओंका भी एक छोटा सा प्रदर्शन मिल सकें.

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